माता पिता और संतान की कुंडली
सनातन वैदिक दर्शन में यह मान्यता है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं, बल्कि एक शाश्वत आत्मा है। यह आत्मा अपने संचित कर्मों के अनुसार अनेक जन्मों की यात्रा करती है। भगवद्गीता, बृहदारण्यक उपनिषद, गरुड़ पुराण तथा अनेक वैदिक ग्रंथ इस सिद्धांत का समर्थन करते हैं कि जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि कर्मों का अत्यंत सूक्ष्म और न्यायपूर्ण परिणाम है। इसी कारण मेरे मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि यदि आत्मा स्वयं अपने कर्मों के अनुसार माता-पिता, परिवार और गर्भ का चयन करती है, तो फिर एक ज्योतिषी केवल जन्म समय के आधार पर भविष्य कैसे बता देता है? क्या माता-पिता की कुंडली भी उतनी ही महत्वपूर्ण नहीं होनी चाहिए? वैदिक शोध और अध्ययन के आधार पर मुझे जो समझ प्राप्त हुई है, वह इस विषय को अत्यंत रोचक और तार्किक बनाती है। मेरे विचार से आत्मा किसी परिवार में संयोगवश जन्म नहीं लेती। उसके पूर्व जन्मों के कर्म ही यह निर्धारित करते हैं कि उसे किस माता-पिता की संतान बनना है, किस देश में जन्म लेना है, किस सामाजिक वातावरण में जीवन प्रारंभ करना है और किन परिस्थितियों का सामना करना है। अर्थ...